Sardar udham Singh biography in hindi

क्रांतिकारी सरदार उधमसिंहजी का जीवन परिचय (Sardar udham Singh biography) 

क्रांतिकारी सरदार उधमसिंहजी… वह वीर जिसने लिया जालियाँवाला बाग़ का बदला..

ऊधम सिंह ने इस हत्याकांड के दोषी जनरल ओडवायर को मार कर बदला पूरा किया।

ऊधम सिंह का बदला संकल्प, संयम और साहस की उत्तम गाथा है।

जालियाँवाला बाग़ हत्याकांड के समय उधामसिंह की उम्र २१ साल थी। उन्हों ने इस भीषण नरसौंहार का बदला लेने का संकल्प किया। लेकिन कुछ समय बाद ही जनरन ओडवायर लंदन आ गए। ऊधमसिंहजी ने फिर भी हार नहीं मानी। उन्हों ने महेनत की और सन 1934 में लंदन पहुँच गए। यहाँ पहोंच कर भी उनके संयम की परीक्षा जारी थी। मौक़े की तलाश में और 6 साल बीत गए। और सन 1940 में आज ही के दिन उन्हों ने भरी सभा में हत्यारे जनरल ओडवायर को सिने में 2 गोली मार अपना बदला पूरा किया। तभी वहाँ की एक स्त्री ने उनको पकड़ रखा और पोलिस ने आके उन्हें पकड़ लिया और जब केस चला तो जज ने पूछा कि तुम्हारी पिस्टल में अभी और गोलियाँ बाक़ी थी तो तुमने उस महिला को क्यों नहीं मारा। तब उधामसिंह ने सर उठा कर जवाब दिया की किसी महिला को मारना भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़ है और मेरे जीवन का ध्येय जनरल ओडवायर को मारना ही था जो पूरा हुआ।

धन्य है ऐसे क्रांतिकारी..

संकल्प – संयम – साहस की गाथा

जालियाँवाला बाग़ का बदला..

आइए जानते हैं, इस महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी के बारे में

उधम सिंह का जीवन परिचय (Udham Singh Biography in Hindi)

पूरा नाम (Full Name) :- शहीद-ए-आज़म सरदार उधम सिंह

माता /पिता ( Mother / Father ) :- नारायण कौर (या नरेन कौर)

जन्म दिन(Birth Date) :- 26 दिसंबर 1899

जन्म स्थान (Birth Place) :- पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम क्षेत्र में हुआ

पेशा (Profession) :- क्रांतिकारी

राजनीतिक पार्टी (Political Party) :- ग़दर पार्टी, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

राष्ट्रीयता (Nationality) :- भारतीय

उम्र (Age) :- 40 वर्ष

गृहनगर (Hometown) :- सुनाम, संगरूर जिला, पंजाब

धर्म (Religion) :- हिंदू

वैवाहिक स्थिति (Marital Status) :- अविवाहित

उधम सिंह का जन्म, परिवार एवं प्रारंभिक जीवन (Udham Singh Birth, Family and Early Life)

उधम सिंह जी का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम में हुआ था, और उनको उस समय लोग शेर सिंह के नाम से जाना करते थे. उनके पिता सरदार तेहाल सिंह जम्मू उपली गांव के रेलवे क्रॉसिंग में वॉचमैन का काम किया करते थे. उनकी माता नारायण कौर उर्फ नरेन कौर एक गृहणी थी. जो अपने दोनों बच्चों उधम सिंह और मुक्ता सिंह की देखभाल भी किया करती थी. परंतु दुर्भाग्यवश दोनों भाइयों के सिर से माता पिता का साया शीघ्र ही हट गया था. उनके पिताजी की मृत्यु 1901 में और पिता की मृत्यु के 6 वर्ष बाद इनकी माता की भी मृत्यु हो गई. ऐसी दुखद परिस्थिति में दोनों भाइयों को अमृतसर के खालसा अनाथालय में आगे का जीवन व्यतीत करने के लिए और शिक्षा दीक्षा लेने के लिए इस अनाथालय में उनको शरण लेनी पड़ी थी. परंतु दुर्भाग्यवश उधम सिंह के भाई का भी साथ ज्यादा समय तक नहीं रहा उनकी भाई की मृत्यु 1917 में ही हो गई थी. अब उधम सिंह पंजाब में तीव्र राजनीति में मची उथल-पुथल के बीच अकेले रह गए थे. उधम सिंह हो रही इन सभी गतिविधियों से अच्छी तरह से रूबरू थे. उधम सिंह ने 1918 में अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूरी कर ली. इसके बाद उन्होंने 1919 में खालसा अनाथालय को छोड़ दिया.

 

उधम सिंह जी की विचारधारा

शहीद भगत सिंह द्वारा किए गए अपने देश के प्रति क्रांतिकारी कार्य और उनके समूहों से उधम सिंह बहुत ही प्रभावित हुए थे.1935 में जब उधम सिंह कश्मीर में थे तब उनको शहीद भगत सिंह के तस्वीर के साथ पकड़ा गया था. उस दौरान उधम सिंह जी को शहीद भगत सिंह जी का सहयोगी मान लिया गया और इसके साथ ही शहीद भगत सिंह का शिष्य उधम सिंह को भी मान लिया गया था. उधम सिंह जी को देश भक्ति गीत बहुत ही पसंद थे, वह उनको हमेशा सुना करते थे. उस समय के महान क्रांतिकारी कवि राम प्रसाद बिस्मिल जी के द्वारा लिखे गए गीतों को सुनने के, वे बहुत शौकीन थे.

 

उधम सिंह जी की कहानी (Udham Singh Story)

जलियांवाला बाग की निंदनीय घटना जलिया वाले बाग में अकारण निर्दोष लोगों को अंग्रेजों ने मृत्यु के घाट उतार दिया था. इस निंदनीय घटना में बहुत सारे लोग मरे थे. जिनमें से कुछ बुजुर्ग, बच्चे , महिलाएं और नौजवान पुरुष भी शामिल थे. इस दिल दहला देने वाली घटना को उधम सिंह ने अपने आंखों से देख लिया था , जिससे उनको बहुत ही गहरा दुख हुआ था और उन्होंने उसी समय ठान लिया, कि यह सब कुछ जिसके इशारे पर हुआ है , उसको उसके किए की सजा जरूर देकर रहेंगे ऐसा उन्होंने उसी समय प्रण ले लिया.

उधम सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियां (Udham Singh Krantikari Gatividhiyan)

उधम सिंह ने अपने द्वारा लिए गए संकल्प को पूरा करने के मकसद से उन्होंने अपने नाम को अलग-अलग जगहों पर बदला और वे दक्षिण अफ्रीका, जिंबाब्वे , ब्राजील , अमेरिका , नैरोबी जैसे बड़े देशों में अपनी यात्राएं की.

उधम सिंह जी, भगत सिंह जी के और राहों पर चलने लगे थे.

1913 में गदर पार्टी का निर्माण किया गया था. इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य भारत में क्रांति भड़काने के लिए किया गया था.

1924 में उधम सिंह जी ने इस पार्टी से जुड़ने का निश्चय कर लिया और वे इससे जुड़ भी गए.

भगत सिंह जी ने उधम सिंह जी को 1927 में वापस अपने देश आने का आदेश दिया.

उधम सिंह वापस लौटने के दौरान अपने साथ 25 सहयोगी, रिवाल्वर और गोला-बारूद जी लेकर आए थे. परंतु इसी दौरान उनको बिना लाइसेंस हथियार रखने के लिए उनको गिरफ्तार कर लिया गया. उन्होंने अगले 4 साल जेल में ही व्यतीत किए सिर्फ यही सोचकर कि, वह बाहर निकल कर जनरल डायर के द्वारा किए गए दंडनीय अपराध का बदला अपने देशवासियों के लिए लेकर रहेंगे.

1931 में जेल से रिहा होने के बाद वे अपने संकल्प को पूरा करने के लिए कश्मीर गए फिर कश्मीर से वे भागकर जर्मनी चले गए.

1934 में उधम सिंह लंदन पहुंच गए और वहां पर उन्होंने अपने कार्य को अंजाम देने के लिए सही समय का इंतजार करना शुरू कर दिया.

भारत का यही वीर पुरुष जलिया वाले बाग के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के “कास्टन हाल” में बैठक थी. जहां माइकल ओ’ डायर को उसके किए का दंड देने के लिए तैयार बैठा था. जैसे ही वह बैठक का वक्त समीप आया वैसे ही उधम सिंह ने आगे बढ़कर जनरल डायर को मारने के लिए दो शॉर्ट दाग दिए, जिससे जनरल डायर की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई.

कहा जाता है, कि उन्होंने इसलिए इस दिन का इंतजार किया ताकि पूरी दुनिया जनरल डायर द्वारा किए गए जघन्य अपराध की सजा पूरी दुनिया देख सकें.

उन्होंने अपने काम को अंजाम देने के बाद गिरफ्तारी के डर से भागने का जरा सा भी प्रयास नहीं किया और उसी जगह पर वह शांत खड़े रहे.

उनको इस बात का गर्व था , कि उन्होंने अपने देशवासियों के लिए वह करके दिखाया जो सभी भारतीय देशवासी चाहते थे. ऐसे ना जाने कितने स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने देश के प्रति अपना प्रेम , सहयोग और अपना आत्मसमर्पण प्रदान किया है.

उधम सिंह की अमूल्य शहादत (Udham Singh Death, Fansi)

जनरल डायर के मृत्यु का दोषी 4 जून 1940 को उधम सिंह को घोषित कर दिया गया. 31 जुलाई 1940 को लंदन के “पेंटोनविले जेल” में उनको फांसी की सजा दी गई.

उधम सिंह जी के मृत शरीर के अवशेष को उनकी पुण्यतिथि 31 जुलाई 1974 के दिन भारत को सौंप दिया गया था.

उधम सिंह जी की अस्थियों को सम्मान पूर्ण भारत वापस लाया गया. और उनके गांव में उनकी समाधि को बनाया गया.

इस तरह उन्होंने अपने देशवासियों के लिए मात्र 40 वर्ष की आयु में अपने आप को समर्पण कर दिया. जिस दिन उधम सिंह जी को फांसी दी गई थी, उसी दिन से भारत में क्रांतिकारियों का आक्रोष अंग्रेजों के प्रति और भी बढ़ गया था. इनके शहीद होने के मात्र 7 वर्ष बाद भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो गया था.

उधम सिंह का सम्मान और विरासत (Udham Singh Honours)

सिखों के हथियार जैसे :- चाकू, डायरी और शूटिंग के दौरान उपयोग की गई गोलियों को स्कॉटलैंड यार्ड में ब्लैक म्यूजियम में उनके सम्मान के रूप में रखा गया है.

राजस्थान के अनूपगढ़ में शहीद उधम सिंह के नाम पर चौकी भी मौजूद है.

अमृतसर के जलिया वाले बाग के नजदीक में सिंह लोगों को समर्पित एक म्यूजियम भी बनाया गया है.

उधम सिंह नगर जो झारखंड में मौजूद है. इस जिले के नाम को भी उन्हीं के नाम से प्रेरित होकर रखा गया था.

उनकी पुण्यतिथि के दिन पंजाब और हरियाणा में सार्वजनिक अवकाश रहता है.

उधम सिंह जी के द्वारा दिए गए बलिदान को कई भारतीय फिल्मों में फिल्माया गया है, जो इस प्रकार हैं:-

जलियांवाला बाग़ (1977)

शहीद उधम सिंह (1977)

शहीद उधम सिंह (2000)

विक्की कौशल स्टारर फिल्म सरदार उधम सिंह (Udham Singh Movie)

सरदार उधम सिंह एक आगामी भारतीय हिंदी भाषा की जीवनी फिल्म है, जो शूजीत सरकार द्वारा निर्देशित है, जिसे रॉनी लाहिड़ी और शील कुमार द्वारा निर्मित और रितेश शाह और शुभेंदु भट्टाचार्य द्वारा राईन सन फिल्म्स और केनो वर्क्स के बैनर तले लिखा गया है. इस फिल्म में विक्की कौशल ने सरदार उधम सिंह जी का किरदार निभाया है. इस फिल्म के माध्यम से सरदार उधम सिंह जी के जीवन में घटित घटनाओं को और उनके उद्देश्य को दर्शकों को दिखाने और समझाने की कोशिश की गई है. इस फिल्म को लगभग 120 करोड़ों रुपए की लागत में बनाया जा रहा है. 2 अक्टूबर 2020 यानी गांधी जी की जयंती के दिन अगले वर्ष हो सकता है कि आप लोगों को सरदार उधम सिंह मूवी को अपने नजदीकी सिनेमाघरों में देखने को मिलें.

हम जिस स्वतंत्र भारत में रह रहे हैं. और हमको जो अपनी स्वतंत्रता पर अभिमान है. उसके पीछे उधम सिंह जैसे स्वतंत्रा सेनानियों का ही हाथ रहा है, इसको सदैव याद रखना चाहिए. हम सभी देशवासियों का यह कर्तव्य बनता है कि हमने जिन जिन स्वतंत्रा सेनानियों के द्वारा आजादी पाई है , उनको सदैव अपने दिल में बरसाए रखे. स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा दिए गए बलिदान को याद रखने के लिए हमें सदैव एकजुट रहना चाहिए और अपनी अखंडता और अपनी एकता पर सदैव गर्व करना चाहिए

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